दुःख जो विश्वास को दृढ़ करता है

हे मेरे भाइयों, जब तुम विभिन्न परीक्षाओं का सामना करते हो तो इसे बडे़ आनन्द की बात समझो, यह जानते हुए कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। (याकूब 1:2-3) 

यह विचित्र लग सकता है कि, दुःखों द्वारा विचलित किए जाने के प्राथमिक उद्देश्यों में से एक हमारे विश्वास को और भी अधिक दृढ़ बनाना है। 

विश्वास मांसपेशियों के ऊतकों के समान है: यदि आप इसे एक सीमा तक खींचते हैं, तो यह कमज़ोर नहीं परन्तु मजबूत हो जाता है। यहाँ पर याकूब का यही अर्थ है। जब आपका विश्वास ख़तरे में पड़ता है और परखा जाता है, तथा उसको टूटने की स्थिति तक खींचा जाता है, तो इसका परिणाम यह होता है कि आपके पास सहने की क्षमता और अधिक हो जाती है। वह इसे दृढ़ता कहता है।

परमेश्वर विश्वास से इतना प्रेम करता है कि वह इसे टूटने की स्थिति तक भी परखेगा, ताकि वह इसे शुद्ध और दृढ़ बनाए रख सके। उदाहरण के लिए, यह उसने 2 कुरिन्थियों 1:8-9 के अनुसार पौलुस के साथ किया है,

क्योंकि हे भाइयो, हम यह नहीं चाहते कि तुम उस क्लेश से अनजान रहो जो हमको एशिया में सहना पड़ा। हम ऐसे भारी बोझ से दब गए थे जो हमारे सामर्थ्य से बाहर था, यहां तक कि हम जीवन की आशा भी छोड़ बैठे थे। वास्तव में, हमें ऐसा लगा जैसे कि हम पर मृत्यु-दण्ड की आज्ञा हो  चुकी हो, जिससे कि हम अपने आप पर नहीं वरन् परमेश्वर पर भरोसा रखें जो मृतकों को जिला उठाता है।

शब्द “जिससे कि” दिखाता है कि इस घोर दुख में एक उद्देश्य था: यह इस कारण से था कि – इस उद्देश्य के लिए कि – पौलुस स्वयं पर और अपने संसाधनों पर भरोसा नहीं करेगा, परन्तु परमेश्वर पर – विशेष रीति से मृतकों को जिला उठाने में प्रतिज्ञा किए हुए परमेश्वर के अनुग्रह पर भरोसा करेगा। 

परमेश्वर हमारे पूर्ण विश्वास को महत्व देता है कि वह, दयालुता से यदि आवश्यक हो तो, संसार में वो सबकुछ को ले लेगा जिस पर हम भरोसा करने के प्रलोभन में पड़ सकते हैं- यहाँ तक कि जीवन को भी। उसका उद्देश्य यह है कि हम अपने भरोसे में गहराई और दृढ़ता से बढ़ें ताकि वह ही हमारा सब कुछ हो जिसकी हमें आवश्यकता है। 

वह हमसे चाहता है कि हम भजनकार के समान यह कह सकें, “स्वर्ग में मेरा और कौन है? तेरे सिवाय मैं पृथ्वी पर और कुछ नहीं चाहता। चाहे मेरा शरीर और मन दोनों हताश हो जाएं, फिर भी परमेश्वर सदा के लिए मेरे हृदय की चट्टान और मेरा भाग है” (भजन संहिता 73:25-26)।

Share on facebook
Share on twitter
Share on email
Share on whatsapp
Share on telegram