प्रभु की प्रार्थना का अनुकरण करना

प्रभु की प्रार्थना का अनुकरण करना (मत्ती 6:9-13)

हम लोग जो यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं प्रार्थना के जीवन में बढ़ना चाहते हैं। हमारे मसीही जीवन में प्रार्थना एक महत्वपूर्ण भाग है। हम में से अधिकांश लोग प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं या करना चाहते हैं। परन्तु समस्या की बात यह है कि हमारी प्रार्थनाएं रटी-रटाई हो जाती हैं या कई बार हम समझ नहीं पाते हैं कि हम क्या प्रार्थना करें। इसलिए हमारे लिए सबसे उपयुक्त यह है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा सिखाई गई प्रार्थना के उदाहरण को देखें और समझें। प्रभु की प्रार्थना पर आधारित निम्नलिखित तीन बातें हमारी प्रार्थना को सुन्दर बनाती हैं –  

परमेश्वर के राज्य के आगमन और उसकी इच्छा की पूर्ति हेतु प्रार्थना

“अतः तुम इस प्रकार प्रार्थना करना: हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है वैसे ही पृथ्वी पर भी पूरी हो।” मत्ती 6:9-10

प्रभु यीशु मसीह अपनी प्रार्थना में सबसे पहले परमेश्वर पिता के गुण को दिखाते हैं कि परमेश्वर कितना पवित्र है और स्वर्ग में विराजमान है। प्रभु यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर पिता की महिमा कर रहे हैं। यीशु मसीह जो अनन्तकाल से परमेश्वर के साथ है, वह उसको सम्पूर्णता से जानता है और वह परमेश्वर की बड़ाई कर रहा है। परमेश्वर अपने गुणों के कारण आराधना के योग्य है। इसलिए, प्रार्थना में हमें भी परमेश्वर की महिमा करना चाहिए।  

परमेश्वर ही समस्त सृष्टि का सृजनहार है और वह सब कुछ पर सम्प्रभु है। वह राजा है। इसलिए यीशु मसीह अपने शिष्यों को परमेश्वर के राज्य पर केन्द्रित प्रार्थना करना सिखा रहे हैं। यह हमारे लिए एक अच्छा नमूना है जिससे हम सीखते हैं कि हमारी प्रार्थना की विषय वस्तु परमेश्वर पिता की इच्छा पर केन्द्रित होना चाहिए। यीशु ने अपने सम्पूर्ण जीवन और मृत्यु से इस पृथ्वी पर परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण किया है, वह हमारे लिए उत्तम आदर्श हैं जिसका हम अनुकरण कर सकते हैं। 

परमेश्वर अपने गुणों के कारण आराधना के योग्य है। इसलिए, प्रार्थना में हमें भी परमेश्वर की महिमा करना चाहिए।  

भौतिक जीवन के सन्दर्भ में प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रार्थना

“हमारे दिन भर की रोटी आज हमें दे” (मत्ती 6:11)।        

यीशु मसीह शिष्यों को सिखाते हैं कि वे अपनी प्रतिदिन की आवश्यकता हेतु भी परमेश्वर के प्रावधान पर निर्भर रहें। यीशु मसीह अपनी प्रार्थना में दिन भर की रोटी के लिए परमेश्वर पिता से मांग करना सिखाते हैं। वे इस बात को स्मरण दिलाते हैं कि हमारे दिन भर की रोटी परमेश्वर ही देता है। परमेश्वर ने जब इस्राएलियों को मिस्र के दासत्व से छुड़ाकर ला रहा था। तब परमेश्वर ने अपने प्रावधान और करुणा में होकर प्रतिदिन मन्ना खिलाता था। उसी प्रकार से यीशु मसीह ने भी पांच हज़ार लोगों को रोटी खिलाई। परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब यीशु मसीह भीड़ को खाना खिलाते हैं तो सर्वप्रथम परमेश्वर पिता से उन रोटियों पर आशीष मांगते हैं। इस प्रकार से यीशु मसीह ने हमारे सम्मुख प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु परमेश्वर पर निर्भरता का उदाहरण रखा।

यीशु मसीह संसार की धन-सम्पत्ति के लिए, पूरे वर्ष के लिए, या अपने पूरे जीवन भर के लिए रोटी की मांग नहीं करते हैं। परन्तु वह केवल आज के लिए दिन भर की रोटी की मांग करते हैं। अपनी प्रार्थना में आत्मिक जीवन के साथ भौतिक वस्तुओं के लिए प्रार्थना करना कोई बुराई नहीं है। क्योंकि परमेश्वर ही है जो हमारी प्रतिदिन की आवश्यकताओं को पूरी करता है। इसलिए हम आत्मिक बातों के साथ प्रतिदिन की आधारभूत भौतिक वस्तुओं के लिए भी प्रार्थना कर सकते हैं।

आत्मिक जीवन के सन्दर्भ में क्षमा और बुराई से बचने हेतु प्रार्थना

“और जैसे हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर; और हमें परीक्षा में न ला ,परन्तु बुराई से बचा” (मत्ती 6:12-13)।

यीशु मसीह अपराधों से क्षमा मांगने की प्रार्थना सिखाते हैं। वह हमें सिखा रहे हैं कि हम न केवल क्षमा मांगे, परन्तु दूसरों को भी क्षमा करने वाले हो सकें। परमेश्वर हम पर दया करके हमारे अपराधों को क्षमा करता है। इसी क्षमा की बात को यीशु मसीह अपने शिष्यों को सिखाते हैं कि वे भी एक-दूसरे को क्षमा करें और स्वयं अपने अपराधों के लिए परमेश्वर से क्षमा मांगे। मसीही जीवन क्षमा से भरा होना चाहिए। प्रभु की यह प्रार्थना हमें भी आपस में एक दूसरे को क्षमा करना और स्वयं परमेश्वर से क्षमा मांगना सिखाती है। इस प्रार्थना से हम सीखते हैं कि हम एक दूसरे पर दोष न लगाएं। परन्तु एक दूसरे की सह लें और एक दूसरे को क्षमा करें, जैसे प्रभु ने स्वयं हमारे अपराधों को क्षमा कर दिया है। यीशु मसीह ने क्रूस पर मृत्यु के द्वारा हमारे अपराओं को क्षमा कर दिया है। हम प्रार्थना करें कि परमेश्वर हमें, एक-दूसरे को क्षमा करने और एक-दूसरे की सह लेने वाला व्यक्ति बनाए। हम अपनी प्रार्थना में परमेश्वर से मांगे कि वह हमें यीशु मसीह के समान क्षमा करने वाला और सहन करने वाला व्यक्ति बनाए।

यीशु मसीह ने क्षमा करने पर बहुत बल दिया। मत्ती 18:21-35 में पाए जाने वाले निर्दयी सेवक के दृष्टान्त के माध्यम से अपने शिष्यों को सिखाया कि हमें “सात बार के सत्तर गुने तक” क्षमा करना है। क्योंकि हमारे असंख्य पापों को परमेश्वर ने मसीह में होकर क्षमा किया है। यहां तक कि मसीह ने स्वयं क्रूस पर से अपने शत्रुओं के लिए यह कहते हुए पिता से प्रार्थना किया,“हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि यह नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं” लूका 23:34। 

प्रभु यीशु मसीह परीक्षा में न पड़ने और बुराई (बुरे या दुष्ट) से बचने के लिए प्रार्थना करना सिखाते हैं। क्योंकि हमारा शत्रु शैतान है जो गर्जने वाले सिंह की भांति इस ताक में रहता है कि किसको फाड़ खाए  (1 पतरस 5:8)। वह अनेक प्रकार से हम विश्वासियों के पीछे पड़ा रहता है। वह हमें बुरी युक्तियों में फंसाना चाहता है, कई बार वह हमें पापों में उलझा कर नाश करना चाहता है। इसलिए यीशु मसीह अपने शिष्यों को सिखाते हैं कि हमें प्रतिदिन शैतान और उसकी युक्तियों बचने के लिए परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता है। 

हम विश्वासी लोग एक आत्मिक युद्ध में हैं। हमारा युद्ध आकाश मेंं रहने वाले अधिकारियों व प्रधानों से है अर्थात् शैतान से है। इसलिए पौलुस इफिसियों 6:6:10-20 में विश्वासियों को उत्साहित करता है कि प्रभु और उसके सामर्थ्य की शक्ति में बलवान बने। परमेश्वर के सारे हथियार (वचन, विश्वास और प्रार्थना) को धारण करें। जिससे कि हम दुष्ट शैतान की युक्तियों का दृढ़ता से सामना कर सकें। 

अन्त में, मैं आपको उत्साहित करना चाहूँगा कि यीशु के प्रार्थना पूर्ण जीवन और प्रार्थना का अनुकरण करें। प्रार्थना के जीवन में यीशु के जैसे बनते जाएं। 

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