हमारी प्रार्थना का आधार

हमारी प्रार्थनाओं को परमेश्वर की इच्छा और सुसमाचार से प्रेरित होना चाहिए। ऐसी प्रार्थना सबसे अधिक परमेश्वर को महिमा देती है। हमने इससे पहले वाले लेख में देखा था कि कैसे बाइबल पर आधारित प्रार्थना में रुकावट आती है। इस लेख में हम देखेंगे कि हमारी प्रार्थना का आधार क्या होना चाहिए। 

परमेश्वर के चरित्र की समझ पर प्रार्थना को आधारित करना – हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और इसलिए यह आवश्यक है कि हम उसके चरित्र और गुणों के बारे में एक सही समझ को विकसित करें। व्यवस्थाविवरण 32:4 में हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर का चरित्र कैसा है- वह चट्टान है, उसका काम खरा है; और उसकी सारी गति न्याय की है। परमेश्वर का चरित्र और उसके गुण समय और परिस्थिति के अनुसार बदलते नहीं हैं। क्योंकि वह अनन्त, अटल और सिद्ध है। किसी भी परिस्थिति या कारणवश वह अपने चरित्र और गुणों के साथ समझौता नहीं कर सकता है। इस सत्य को समझना आवश्यक है। क्योंकि यह हमें परमेश्वर के अनन्त, अटल और सिद्ध गुण के समझ की सीमा में रहकर प्रार्थना करने के लिए सहायता करता है।  

इसके विपरीत, कठिन और असहज परिस्थिति में भी हम प्रार्थना में परमेश्वर पर अपने भरोसे और विश्वास को व्यक्त कर सकते हैं। हम भयभीत, निराश और कठोर नहीं बन जाते और न ही कुड़कुड़ाते या शिकायत करने लगते हैं। क्योंकि परमेश्वर का चरित्र सिद्ध है इसलिए वह कभी बुरा और गलत नहीं कर सकता; इस आश्वासन के साथ प्रार्थना करना दर्शाता है कि हमारी प्रार्थना परमेश्वर के चरित्र की समझ पर आधारित है।

परमेश्वर की सर्वोत्तम इच्छा पर प्रार्थना को आधारित करना – परमेश्वर की सर्वोत्तम इच्छा क्या है? परमेश्वर सर्वोत्तम इच्छा है कि वह अपने नाम को महिमान्वित करे। और हम विश्वासी धन्यवाद देने और प्रार्थनाओं को करने के द्वारा परमेश्वर की महिमा कर सकते हैं। हमारी प्रार्थना सिर्फ मांगने तक सीमित नहीं होनी चाहिए परन्तु वह त्रिएक परमेश्वर के सामने ग्रहणयोग्य बलिदान होना चाहिए। बाइबल आधारित प्रार्थना त्रिएक परमेश्वर की महिमा करती है। परमेश्वर की इच्छा हमारे लिए धन, वैभव, सम्पन्नता और प्रसिद्धि अर्जित करना नहीं है। परन्तु सुसमाचार की उन्नति हेतु की जाने वाली प्रार्थनाएं परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है। परमेश्वर चाहता है कि सुसमाचार के द्वारा लोगों के जीवन परिवर्तित हों। लोग अपने पापों से फिरकर यीशु मसीह के पास आएं और अनन्त जीवन को प्राप्त करें। इसलिए हमें सुसमाचार के प्रसार और उसके कार्य के लिए निरन्तर प्रार्थना करना चाहिए।

हमारी प्रार्थना सिर्फ मांगने तक सीमित नहीं होनी चाहिए परन्तु वह त्रिएक परमेश्वर के सामने ग्रहणयोग्य बलिदान होना चाहिए।

परमेश्वर की इच्छा यह है कि मसीह की देह (कलीसिया) उन्नति करे। प्रेरितों के काम हम पाते है कि प्रेरित और अन्य विश्वासी सुसमाचार का प्रचार करते हुए कलीसियाओं की स्थापना करते जा रहे थे। यीशु मसीह कलीसिया से प्रेम करते हैं और उन्होंने कलीसिया के लिए अपने लहू को बहाया है। परमेश्वर की इच्छा है कि वचन के आधार पर और कलीसियाओं का निर्माण हो। तो हम जो स्थानीय कलीसिया के भाग है हमारा उत्तरदायित्व है कि हम और अधिक वर्तमान कलीसियाओं के लिए और साथ ही साथ नई कलीसियाओं की स्थापना के लिए प्रार्थना करें।   

परमेश्वर की इच्छा यह है कि हम उसके पुत्र के स्वरूप में बढ़ते चले जाएं। परमेश्वर ने हमारे उद्धार के कार्य को पूरा कर दिया है। हम धर्मी ठहरा दिए गए हैं और अब हम पवित्रता में बढ़ रहे हैं अर्थात् उसके पुत्र के स्वरूप में बढ़ते जा रहे हैं। परमेश्वर की इच्छा है कि विश्वासी संसार, शरीर और शैतान से लड़ते हुए पवित्रता में बढ़ते चले जाएं। परमेश्वर सुसमाचार और कलीसिया के द्वारा अपनी महिमा को प्रदर्शित करता है। इसलिए हमें उसकी इच्छा के अनुसार अपनी प्रार्थनाओं को केन्द्रित करना चाहिए।

सुसमाचार पर प्रार्थना को आधारित करना – बाइबल इस बात पर स्पष्ट है कि हम अपने अपराध और पाप में मरे हुए थे। हम क्रोध की सन्तान थे, परन्तु अब हम परमेश्वर के लेपालक सन्तान बन चुके हैं। यीशु मसीह हमारा मध्यस्थ बना ताकि वह परमेश्वर पिता से हमारा मेल-मिलाप कराए। हम केवल यीशु के द्वारा ही परमेश्वर तक पहुंच सकते हैं। वही एक मात्र मार्ग है और केवल वही एक मात्र नाम है जिससे पापों की क्षमा और उद्धार सम्भव है। प्रार्थना आत्मविश्वास, प्रभावशाली शब्द और वाक्यों, बाइबल की जानकारी इत्यादि पर आधारित नहीं होनी चाहिए। सुसमाचार के अनुसार क्रूस पर यीशु के प्रति-स्थापना रूपी कार्य पर मनुष्य के विश्वास और अंगीकार के द्वारा परमेश्वर के साथ मनुष्य का मेल-मिलाप उसे परमेश्वर के पास प्रार्थना में आने का साहस देता है। प्रार्थना में परमेश्वर को और उसके पुत्र को इन बातों के लिए धन्यवाद देना, प्रशंसा करना, स्तुति करना बाइबिल आधारित प्रार्थना है। इफिसियों 1:17-19 में प्रेरित पौलुस प्रार्थना कर रहा है कि यीशु हमें ज्ञान और प्रकाशन की आत्मा दे और हमारे मन की आंखें ज्योतिर्मय हों कि हम जान ले कि उसकी बुलाने की आशा क्या है, और पवित्र लोगों में उसके उत्तराधिकार की महिमा का धन क्या है।

हमारे लिए सबसे बड़ा उदाहरण यीशु मसीह है, जिसके जीवन में हम प्रार्थना में कोई कुटिलता, स्वार्थ, अपनी अभिलाषा की पूर्ति जैसी बातों को नहीं पाते हैं। यीशु की प्रार्थना सदैव परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने, परमेश्वर के राज्य को बढ़ाने, पिता को महिमा देने, पिता के प्रति आज्ञाकारी बने रहने जैसी बातों पर आधारित थी। हमें भी इस तरह की प्रार्थना को नियमित रूप से अभ्यास में लाना चाहिए। प्रार्थना करना एक ऐसी जीवन-शैली है जिसमें हमें प्रार्थना के जीवन को निरन्तर विकसित करने की आवश्यकता है। अनुशासन, सुसमाचार की समझ में बढ़ते रहना, पवित्र आत्मा पर निर्भरता हमें बाइबल पर आधारित प्रार्थना करने में सहायता करता है जिसके द्वारा हम परमेश्वर को सही मायने में महिमा दे सकते हैं। 

अतः हमें स्मरण रखना चाहिए कि वचन के सही सन्दर्भ के प्रकाश में, परमेश्वर की महिमा के लिए और एक-दूसरे की आत्मिक उन्नति  हेतु की जाने वाली हमारी प्रार्थनाएं बाइबल आधारित प्रार्थनाएं होती हैं।

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